कबीर दास के दोहे अर्थ सहित हिन्दी में | कबीर के दोहे

kabir ke dohe in hindi : किसी ने ठीक ही कहा शासक या कोई भी हस्ती बुलबुले की तरह होती है, मगर रचनाकार हमेशा जीवित रहता हैं. अन्य के सम्बन्ध में हम पढ़ते है उसने कहा था, मगर साहित्यकारों की व्याख्या कबीर दास इस दोहे में कह रहे हैं. यानी वे अपनी रचना के बल आज भी जिन्दा हैं. महान काव्यकार कबीर दास भले ही आज से 500 साल पहले जन्में हो, मगर कबीर के दोहे (kabir ke dohe) आज भी जनमानस में जिन्दा हैं. वे आज भी एक अट्टल लकीर पर खड़े नजर आते हैं, जिस पर जाति धर्म सम्प्रदाय किसी का प्रभाव नही पड़ा. कबीर दास के दोहे अर्थसहित हम यहाँ पर दे रहे हैं.

कबीर दास के दोहे अर्थ सहित हिन्दी में | कबीर के दोहेकबीर दास के दोहे अर्थ सहित हिन्दी में | कबीर के दोहे

kabir Das Ke Dohe In Hindi With Meaning:-अमर हिंदी कवि कबीरदास का जन्म 1398 के आस-पास उत्तरप्रदेश के वाराणसी में माना जाता हैं. उनके जन्म के सम्बन्ध में कोई भी ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध नही हैं. कहा जाता है कि उनका जन्म एक जुलाहा परिवार में हुआ था. नीरू व नामा इनके माता-पिता का नाम बताया जाता है. इस भक्तिकालीन काव्य धारा के कवि ने सूत कातकर अपने घर का खर्च निर्वहन किया था. कबीर के मुख्य ग्रंथों में बीजक साखी ,सबद, रमैनी आदि को माना जाता हैं. कबीर ने अधिकतर साहित्य की रचना दोहे एवं चौपाई में ही की. जन जन में प्रसिद्ध कबीरदास के दोहे अर्थ के साथ यहाँ दिए जा रहे हैं. 1448 में कबीर का निधन हो गया था. निर्गुणवादी विचारधारा के प्रवर्तक कवि के रूप में कबीर को मानने वालों की संख्या लाखों में हैं. कबीर जयंती पर उनके भजनों दोहों एवं गीतों को सुना जाता हैं.

कबीर दास के दोहे अर्थ के साथ हिंदी भाषा में (कक्षा 1,2,3,4,5,6,7,8,9,10,11,12)

  • बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
    जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

अर्थ- इस दोहे के माध्यम से कबीर दास कह रहे है कि जब मैं दुनियां में सबसे बुरा व्यक्ति खोजने निकला तो मैंने पाया मुझसे बुरा व्यक्ति कोई नही हैं.

  • जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,
    मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।

अर्थ- इस दोहे में कबीर बताते है कि ज्ञानी व्यक्ति से उनकी जाति न पूछकर उनसे ज्ञान की चर्चा करनी चाहिए, असली कीमत तो ज्ञान की है, जिस तरह कीमती तो तलवार होती है म्यान केवल उन्हें ढकने का काम करती हैं.

कबीर के दोहे

  • जो उग्या सो अन्तबै, फूल्या सो कुमलाहीं।
    जो चिनिया सो ढही पड़े, जो आया सो जाहीं।

अर्थ- इस दोहे के माध्यम से कबीर मनुष्य के शाश्वर शरीर के बारे में कहते है आना और जाना तो प्रकृति का नियम हैं. जो उगा है उसे एक दिन मिटना है जो फुल खिला है उसे एक दिन मुरझाना है, जो निर्माण हुआ हैं उसका एक दिन विनाश निश्चिन्त हैं.

  • आछे / पाछे दिन पाछे गए हरी से किया न हेत |
    अब पछताए होत क्या, चिडिया चुग गई खेत ||

अर्थ- कबीर कहते है हमने निकम्मे बैठे बैठे सारा समय फिजूल में ही व्यतीत कर दिया, जब भगवान् का नाम स्मरण करने का समय था जब हम गफे हाकते रहे. अब पछताने से क्या होगा? जिस तरह किसान के हरे भरे खेत को बिना रखवाली के चिड़ियाँ चुग जाती है, फिर भले ही कितने ही पछता ले कोई फर्क नही पड़ने वाला हैं.

  • गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पाँय ।
    बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो मिलाय

अर्थ- कबीर अपनी दुविधा की स्थिति इस दोहे के माध्यम से बता रहे है. उनका कहना है कि ईश्वर एवं गुरुदेव दोनों मेरे सामने खड़े है. अब मै किसके चरण छुऊ. आखिर वो निश्चय करते है गुरु ही भगवान् से बड़े है गुरु के ज्ञान के कारण ही हमारा इस दुनियां से परिचय हुआ. हम जान पाए कौन भगवान् है, आज भगवान के सामने खड़े है और उनकों पहचान पा रहे है तो यह गुरु की वजह से ही संभव हो पाया हैं.

  • जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही |
    सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही ||

अर्थ : जब मैं अपने अहंकार में डूबा था – तब प्रभु को न देख पाता था – लेकिन जब गुरु ने ज्ञान का दीपक मेरे भीतर प्रकाशित किया तब अज्ञान का सब अन्धकार मिट गया – ज्ञान की ज्योति से अहंकार जाता रहा और ज्ञान के आलोक में प्रभु को पाया.

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